Friday, June 03, 2016

' एक पत्रकार ने बेटी बनकर जब ज्योति को साया दिया '

संवेदना और इंसानियत के लिए दुःख को समझने वाला ह्रदय भी लाजमी है  !

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पन्ना / बाँदा - पत्रकारिता पेशा है तो खबर तो करनी पड़ेगी ! डेस्क में बैठकर हो या ग्राउंड में निकलकर बीहड़ो और खेत - खलिहान की ख़ाक छानकर ! बुंदेलखंड के दौरे पर एक के बाद एक पत्रकार आये, उनका साथ रहा ,उनसे सीखता रहा और नए साथ- जुड़ाव के साथ हम अपने - अपने किरदार में रमते रहे ! जिसका जितना बड़ा बैनर हुआ अक्सर वो उतना ही ग्रास स्तर पर दिखा अपवाद की बात छोड़े दे या जिनमे नैसर्गिक पत्रकारिता ( अरविन्द कुमार सिंह @ राज्य सभा टीवी,पियूष बबेले@ इंडिया टुडे,पंकज जयसवाल @ हिंदुस्तान टाइम्स)और संवेदना बाकी है ! या जो सामान्य परिवार से कलमकार बने ! 
बीते दिवस पन्ना जाना हुआ ! साथ में युसूफ बेग,प्रथ्वी ट्रस्ट थे ! उनके साथ मै और संध्या जी पन्ना टाइगर रिजर्व के अन्दर बसे आदिवासी गाँव मनौर गुडयाना गए ! युसफ का वहां जाना अक्सर होता है ! आदिवासी बस्ती कहे या गरीबी और जिंदगी की बुनयादी आवश्यकता से बेदखल एक टोला ! किसानों ने सूखे और जलसंकट के चलते अपने खेत ईट- भट्टे वालों को लीज पर दे रखे है ! उनमे परिवार सहित श्रम करके वे अपना बसर करते है ! रविवार का दिन आदिवासी लोगो के लिए रंगीन मिजाजी का होता है सो गरीबी में कच्ची शराब / ठर्रा और मांस से मन बहल जाता है ! वैसे विकास के चिथड़ो ने इन इलाकों में मोबाइल,डिस टीवी और मोटर वाहन,सीसी सड़के पहुंचा दिए है ! लेकिन यह पूरे पन्ना टाइगर में अभी भी नही है खाशकर जो गाँव केन- बेतवा लिंक से विस्थापित हो रहे है ! वहां सड़के और अन्य साधन एनजीटी/ पर्यावरण मंत्रालय के दखल से अभी दूर है बनिस्बत मनौर गुडयाना के ! इसी गाँव में रहती है 'ज्योति ' अतिकुपोसित और टीवी के साथ फांकाकसी में उलझी सांसे !! बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ का नारा यहाँ बेहाल - फटेहाल है !
                                         

इलाज के आभाव में शरीर पर हुए गहरे घाव में मवाद पड़ा तो बात बात युसूफ बेग तक पहुंची ! उन्होंने पीड़ित परिवार की मदद की और बिटिया अब पहले से बेहतर है ! उसको समय से दवा मिल जाए यही बहुत है सेब- संतरा और दूध तो दूर का आसरा है ! बिजली का बिल अदा करने की हैसियत हो न हो उसकी झोपड़ी में इलेक्ट्रानिक मीटर चस्पा है ! जब हम उसके पास पहुंचे तो उम्मीद से देखती उसकी माँ और ज्योति के पास बैठना हुआ ! बस्ती में अन्य लोगो की तरह उनके भी हलात पर चर्चा की ! ज्योति के घाव देखकर अमीर घर में जन्मे बच्चो के बचपन और उनकी जिद पर ध्यान गया तो ' तारे जमीन पर ' की बात याद आते ही वापस ज्योति पर ठिठक गए ! उस दिन तपते हुए आसमान से अंगारे बरस रहे थे ऐसे में संध्या जी की रिपोर्टिंग से अपना भी दम बनता रहा ! शरीर पर टेरीकाट के कपडे को ओढ़े बिटिया को शायद उलझन हो रही थी तो मेरे मुंह से निकला कि इसको सूती या काटन के कपड़े से उढ़ा दिया करे जलन नही होगी ! शब्द का निकलना क्या हुआ पास बैठी संध्या जी ने अपनी चुनरी / ओढ़नी ज्योति के ऊपर डाल दी ! तस्वीर लेने से मना करने पर मैंने ही कहा कि ऐसे हरकतें जाने कितनों को नसीहत देती है ! आशा में जिंदा ज्योति को उजाले के लिए हमारी दुआ और सहारे की दरकार है ! कहते है बचपन जितना खुबसूरत हो मन उतना खिलता है और बालपन जितना कठोर / ज़िल्लत भरा हो बड़े होकर आत्मा उतनी तंग अथवा संवेदनशील हो जाती है ! हमें क्या करना चाहिए अपने आसपास कुछ बचाकर ऐसों के लिए ...बस यही कहना था !!

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