Wednesday, August 31, 2016

डकैतों की तर्ज पर लोकसेवक नेता बन गए है !

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' लोकतंत्र का रूप है कैसा, कहाँ गया चौरासी पैसा ' ?

एक देश भक्त ने चोर लिख दिया संसद की दीवारों पर,लोकतंत्र मूर्खो का शासन छपी खबर अख़बारों पर ! 

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- पांच वर्ष के लिए निर्वाचित लोकसेवक लोक का मालिक !
- मतदाता से बगैर पूछे विधायिका में बढे विधायकों के वेतन,भत्ते,रेलवे कूपन
- एक विधायक के मासिक वेतन हुआ 1.25 लाख रूपये,सालाना रेलवे कूपन 1.25 लाख,जनसेवा भत्ता 2 हजार प्रतिदिन,सत्र के दौरान डीए 1500 रूपये प्रतिदिन,निजी कार में 25 हजार रूपये का ईधन मासिक मिलेगा !
- किसी भी देश भक्त,वाम पंथी,सेक्युलर,बहुजनवादी,समाजवादी विधायक ने नहीं किया वेतन बढ़ोत्तरी का विरोध ! क्योंकि नियत सबकी पापी है !
- क्या देश के अख़बार,न्यूज़ चैनल एक हफ्ते भी इसी पर लाइव डिबेट करेंगे ?
- उत्तर प्रदेश के 37 पर्यटन आवास / टूरिस्ट बंगले 1 रुपया सालाना लीज पर देंगे समाजवादी अखिलेश यादव ! 
- प्रदेश सरकार का तर्क ये पर्यटन आवास घाटे में है इसलिए निजीकरण होगा !
- क्या गरीब पब्लिक / सामान्य आदमी को ये बंगले किराये पर नही दिए जा सकते ? मुझे दीजिये मै लेने को तैयार हूँ अखिलेश यादव जी !


  -एक रूपये सालाना लीज पर भू-माफिया,कारपोरेट,नेता क्यों हथिया लेवे सरकारी संम्पति ?
- देश के साढ़े तीन हजार चुने हुए ' लोकसेवक ' देश को गिरवी रख रहे है ! ये आपके भाग्यविधाता भी है !
- उत्तर प्रदेश के चार सौ विधायक तर्क ये देंगे कि दिल्ली,मुंबई,विदेशो में भी तो वेतन अधिक मिल रहा है !
- देश के बौद्धिक युवा अब आईएएस / तकनीकी / कार्पोरेट में जाने से बेहतर इस राजनीतिक पेशे में क्यों नही आ रहे ? 
- व्यवस्था को गाली देने,भ्रष्ट दल के थोपे प्रत्याशी से अच्छा क्या हम निर्दलीय चरित्रवान,कर्मठ सामान्य आदमी को लोकसेवक / विधायक / सांसद नही बना सकते ? 
- अब से तीन दशक पहले क्या राजनीतिक व्यवस्था इतनी बेख़ौफ़,दबंग और निरंकुश थी ?
- आर्थिक असमानता से घिरा ये भारत का लोकतंत्र क्या वैचारिक गुलामी की तरफ नही जा रहा है ?
- हाल ही में उत्तर प्रदेश का अनुपूरक 25 हजार करोड़ का बजट पेश हुआ उसमे आपदा क्षेत्र बुंदेलखंड का पूरा बजट और सैफई के बजट की तुलना कर ले बाकि जिलों की तो बात ही क्या ! 
बाँदा - 1 सितम्बर को समाचार पत्र में प्रकाशित मंत्रियो के बाद विधायको के वेतन मासिक 1.25 लाख रूपये होने पर पैलानी रहवासी सूचनाधिकार कार्यकर्ता सुनील श्रीवास्तव ने फोन किया ' भाई जी ये व्यवस्था कैसे बदलेगी ' उसको सुनता रहा ! मेरे पास उसके सवालों का उत्तर नहीं था ! उससे यही कहाँ कि गाँव के डिग्री धारक लडको से कहो चौपाल में बैठकर जुआ खेलना बंद करे,चुनावी घड़ियालों की जूठन न खाए ! दारु,मुर्गा,गाड़ी - हल्ले के भोकाल में मुद्दा विहीन नेताओं ( उनमें बालू माफिया,दुराचारी,दलबदलू,दबंग आदि ) का बहिस्कार करों ! इनसे इनका चुनावी एजेंडा,घोषणा पत्र रजिस्टर्ड शपथ पत्र में लो ! चुनाव जीतने के बाद गर ये मुकरे तो इनकी सार्वजानिक झांकी भर्सना-अपमानित करके चौराहा बनाकर निकालों ! सरकारी मातहती को छोड़कर किसान के बेटे और किसान के साथ शहरी लोग गंभीरता से अपने बीच के निर्दलीय - कर्मठ भले ही वो धन से वंचित हो व्यक्ति को मतदाता अपने घोषणा पत्र बनाकर लोकसेवक बनाये ! एमबीए,बीटेक,आईटी में घूस देकर नौकरी करने वाले युवा इस देश में बदलाव के लिए राजनीतिक कार्यभार अपनाये ! ऐसा हाल में कुछ एक ग्राम प्रधानी में प्रयोग हुए भी है ! ( राजस्थान के सोडा ग्राम पंचायत,जयपुर की छवि रजावतसहित यूपी के ग्राम प्रधान चुनाव में पढ़े - लिखे युवा आये )  बाकि जिंदगी भर मलाल करने से अच्छा है या तो राजनीतिक आतंकवादियों का सफाया करो या खुद को इसी परतंत्रता के लिए समर्पित करे रहो ! अपनी नस्लों को तिल-तिल कर मरने और कुंठित रहने के लिए ! मेरे पास सुनील यही समाधान है भारत माता को बचाने के लिए ! नही तो आत्महत्या कर लो व्यथित होकर !! वही राज्यसभा टीवी के संवाददाता अरविन्द कुमार सिंह फेसबुक मेंलिखते है कि 
केजरीवाल साहब के लिए जान केरी ने बेहतरीन कमेंट दिया है। वाकई लोग समय से पहुंचे थे उनसे जान केरी ने पूछा क्या आप लोग नाव से आए हैं। बातें दिल्ली के कायाकल्प की हुई थी लेकिन दिल्ली तीन घंटे की बारिश में भी नदी बन जाये तो बेशक नीति निर्माताओं को पानी पानी हो ही जाना चाहिए। उस सरकार को तो और भी जिसका 40,000 करोड़ रुपए से अधिक का सालाना बजट है जो कई पूर्ण राज्यों से भी अधिक है।#यूपीसीएम #आजादभारत #वैचारिकगुलामी

1 Comments:

At September 1, 2016 at 1:58 AM , Blogger आशीष सागर said...

Arvind K Singh
केजरीवाल साहब के लिए जान केरी ने बेहतरीन कमेंट दिया है। वाकई लोग समय से पहुंचे थे उनसे जान केरी ने पूछा....क्या आप लोग नाव से आए हैं।....बातें दिल्ली के कायाकल्प की हुई थी लेकिन दिल्ली तीन घंटे की बारिश में भी नदी बन जाये तो बेशक नीति निर्माताओं को पानी पानी हो ही जाना चाहिए। उस सरकार को तो और भी जिसका 40,000 करोड़ रुपए से अधिक का सालाना बजट है जो कई पूर्ण राज्यों से भी अधिक है।

 

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