Friday, August 31, 2012

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आशीष सागर दीक्षित
रोज की आपा-धापी (भागदौड़) और जरूरतों के बीच,
कुछ अनकहे शब्द डायरी में उतारो।
अन्तर की घुटन, जीवन का मर्म, अस्मिता पर खड़े होते यक्ष प्रश्न!
खुद से, खुदी के रंग कोरे कागज में उभारो,
कुछ अनकहे  शब्द डायरी में उतारो।।
टूटते रिश्ते, मिटती संवेदना, स्वार्थी मान्यता,
क्यो बन गई हैं उलझनें ?
हैं कहां मतभेद, आपमें या मुझमें, मिलकर सुधारो,
कुछ अनकहे शब्द डायरी में उतारो।।
माकूल है लम्हा रोशनी के लिए,
न उदास कर चेहरा इक खुशी के लिए।
बोझिल सी जि़न्दगी बेमानी है यार,
हम भी दे सकते हैं भावना को आकार।
अपनों के लिए सपने संवारो,
हंसते हुए पल-प्रतिपल गुजारो।
कुछ अनकहे शब्द डायरी में उतारो।।
मां के गर्भ में पनपती ऋचाएं, 
राष्ट्र को देने लगेगीं दिशाएं।
उम्मीद से है सब कुछ न उम्मीद को हारो,
कुछ अनकहे शब्द डायरी में उतारो।।
आशीष दीक्षित सागर, बुंदेलखंड क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता एवं जन सूचना अधिकार एक्टिविस्ट है ,बुंदेलखंड में गुजरे तीन वर्षो से यह पर्यावरण – वन जीवो ,जल ज़मीन और जंगल को बचाने की मुहिम को लेकर सक्रिय है साथ ही वहां किये जा रहे खनन माफियाओ के काला सोना ( ब्लैक स्टोन ) की खदानों से टूटते पर्यावरण के इको सिस्टम को सहेजने के लिए लगातार बुन्देली बाशिंदों के बीच समाज कार्य करते है, लेखक बतौर प्रवास सोसाइटी के संचालक की भूमिका में किसान ,मजदूर ,महिलाओ और आदिवासियों के पुनर्वास का भी जन अभियान चलाने का बीड़ा उठाये है !

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