Wednesday, August 01, 2012

उत्तर प्रदेश में लोक आयुक्त सूचना अधिकार दायरे से बाहर

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मायावती सरकार के लिए मुसीबत बने और मुलायम सरकार के राजदुलारे रहे लोकायुक्त को उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके काम का ईनाम दे दिया है. आरटीआई कार्यकर्ता आशीष दीक्षित सागर ने एक बयान जारी कर बताया कि समाजवादी सरकार उत्तर प्रदेश ने कैबनेट की बैठक करके लोक आयुक्त को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर
कर दिया है. उन्होंने कहा कि भ्रष्ट मंत्रियो की जांच रिपोर्ट मीडिया के सामने और सार्वजनिक रूप में नहीं आने पाए इस वास्ते सपा सरकार का बसपा से व तमाम अन्य मंत्रियो को बचाने का यह प्रयास है, ये वही समाजवादी सरकार है
जिसके बयान थे की सरकार बनते ही मायावती जेल में होगी और उनकी मूर्तिया, पार्क पर बुलडोजर चलाया जायेगा. दीक्षित ने कहा कि मायावती की मूर्ति तोड़ने पर भारत के कानून ने राष्ट्र निष्ठा की पहल करने वालो पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा समाजवादी सरकार के रहते ही लगाया है, अब लोक आयुक्त को सूचना अधिकार से बाहर कर अखिलेश यादव ने बतला दिया है कि हम भी भ्रष्टाचार के हमाम में पाच साल नहायेगे तो भला कैसे लोक आयुक्त को आजाद करे,
दरअसल उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त को सूचना अधिकार की अवमानना करने के खातिर माननीय राज्य सूचना आयोग के सामने आगामी पाच सितम्बर को पेश होना था …..ऐसे में यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की लोक आयुक्त
के साथ साज़िश और भ्रष्ट मंत्रियो को बचाने की कवायद को बेनकाब करता है ……….
पिछले कुछ समय से आरोप लगते रहे हैं कि लोकायुक्त कार्यालय में कुछ गड़बड़ काम हो रहे हैं. शायद इसीलिये राज्य सरकार ने यह कदम उठाया है.
आशीष सागर ने बताया कि वे इसके विरोध में बांदा में ज्ञापन प्रधान मंत्री के नाम ज्ञापन देकर, मुर्गा प्रदर्शन करेंगे – हल्ला बोल ?

उत्तर प्रदेश में लोक आयुक्त सूचना अधिकार दायरे से बाहर

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लोक आयुक्त को सूचना अधिकार की अवमानना करने के खातिर राज्य सूचना आयोग के सामने पांच सितम्बर को पेश होना था. ऐसे में उससे पहले ही लोकायुक्त को आरटीआई के दायरे से बाहर करने का फैसला सरकार की लोक आयुक्त के साथ साजिश और भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने की कवायद लगती है....
जनज्वार. उत्तर प्रदेश सरकार ने आज 31 जुलाई को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की एक महत्वपूर्ण बैठक में लोकायुक्त को आरटीआई (सूचना अधिकार-2005) के दायरे से बाहर कर दिया है. सरकार के इस कदम की चौतरफा कड़ी निंदा हो रही है और इसे जनविरोधी बताया जा रहा है. प्रदेश सरकार ने इस तरह के फैसले पर सफाइ देते हुए कहा कि चूंकि लोकायुक्त एक जांच एजेंसी है, इसलिए उसकी गोपनीयता बनाये रखने के लिए यह जरूरी था कि इसे आरटीआई  के दायरे से बाहर किया जाये. 
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मगर सरकार के इस फैसले की खूब भर्त्सना हो रही है. माना जा रहा है कि लोकायुक्त को सूचना अधिकार-2005 के दायरे से इसलिए बाहर किया जा रहा है ताकि भ्रष्ट मंत्रियों की जांच रिपोर्ट मीडिया के माध्यम से जनता के सामने सार्वजनिक रूप में नहीं आने पाए.
अखिलेश सरकार का यह कदम पिछली बसपा सरकार के तमाम भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने के लिए उठाया गया माना जा रहा है. गौरतलब है कि ये वही समाजवादी सरकार है जिसने सरकार बनाने से पहले बयान दिया था कि सपा सरकार बनते ही मायावती जेल में होंगी. उनकी मूर्तियों और पार्क पर बुलडोजर चलाया जायेगा. 
और इसके बाद मायावती की मूर्ति तोड़ने वालों पर भारत के कानून ने राष्ट्रद्रोह का मुकदमा समाजवादी सरकार के रहते हुए लगाया है. अब लोक आयुक्त को सूचना अधिकार से बाहर कर सूबे के मुखिया अखिलेश यादव ने जता दिया है कि हम भी पूर्ववर्ती माया सरकार की तरह भ्रष्टाचार के हमाम में पांच साल तक नहायेंगे. जाहिर तौर पर ऐसे मे भ्रष्ट मंत्रियों के लिए लोक आयुक्त राह का रोड़ा बनता. 
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त को सूचना अधिकार की अवमानना करने के खातिर माननीय राज्य सूचना आयोग के सामने आगामी पांच सितम्बर को पेश होना था. ऐसे में पांच सितम्बर से पहले ही कैबिनेट की बैठक में लोकायुक्त को आरटीआई (सूचना अधिकार) के दायरे से बाहर करने का फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की लोक आयुक्त के साथ साजिश और भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने की कवायद लगती है. 
इस जनविरोधी कदम की निंदा करने के लिए कल एक अगस्त को बांदा में प्रधानमंत्री को ज्ञापन लिख सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और हल्ला बोल किया जायेगा.



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