Thursday, May 03, 2012

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आशीष सागर
‘नंगे पैर चलती हूं खेत की पगडडिंयों पर, कहीं तो आड़ मिल जाए इज्जत छिपाने के लिए’,     इस पंक्ति की तह में उबलती है बंुदेलखंड की महिलाओं में दिशा मैदान जाने की टीस।
चैदह करोड़ रूपए खर्च होने के बावजूद बुंदेलखंड के बांदा जिले में संपूर्ण स्वच्छता अभियान का हाल सिफर है। शौचालय निर्माण के लिए जिला पंचायत राज विभाग में रेवड़ी की तरह शौचालयों का पैसा कागजो में बांटा है। दावा किया गया है कि 58 हजार ग्रामीण परिवारों को संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय मुहैया कराए गए हैं। हकीकत देखें तो तस्वीर इससे इतर है। बने शौचालयों में से अधिकतर ऐसे हैं जिन्हे बंुदेलखंड के वाशिंदे नित्य क्रिया के दौरान उपयोग ही नही करते हैं। आम गांव ही नहीं बांदा जिले के वर्ष 2012 तक चुने गए 20 निर्मल ग्राम पंचायतो में से किसी की भी गांव स्तर पर जाकर जांच नहीं करवाई गई है। यकीनन अगर प्रदेश की सरकार और प्रशासनिक अमला सही जांच करवाए तो चयनित हुये सभी निर्मल गांव काली सूची में चले जाएंगे।
हालात ये हैं कि आंकड़ों की बाजीगरी में जिले के 13,9,329 परिवार आज भी शौचालय विहीन हैं कागजी आंकडो में दर्ज बुंदेलखंड के सात जिले की 90 फीसदी जिले की आबादी आज भी खुले मैदान में शौच को जाती है संपूर्ण स्वच्छता अभियान खासकर ग्रामीण इलाकों के लिए चलाई गई योजना है। इस योजना के तहत प्रदेश के सभी 72 जिलो के साथ-साथ बुंदेलखड के सात जिलों में कहीं जिला पंचायती राज्य विभाग ने स्वयं तो कहीं स्वयं सेवी संगठनों के सहयोग से शौचालयों, सोख्ता टैंक का निर्माण करवाया है। योजना के मुताबिक 2200 रू0 प्रति शौचालय दिया जाता है। स्वच्छता कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष 2009-10 में 1570.32 लाख रू0 की धनराशि जनपद बांदा में अवमुक्त की गई। जिला प्रशासन की तरफ से दावा किया जा रहा है कि इसमें से 1438.41 लाख रू0 शौचालय निर्माण पर खर्च किए गए इस मोटी रकम में से 58,290 शौचालयों का गांव स्तर पर निर्माण कराया गया। प्रशासनिक दावों के अनुसार बीस लाख की आबादी वाले जनपद बांदा में सिर्फ 1.40 लाख परिवार शौचालय विहीन हैं। जिला प्रशासन के लिए शायद ये आंकड़ा बीस लाख की आबादी के हिसाब से बहुत कम है। बताया जाता है संपूर्ण स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत वर्ष 2006-07 में जिले की 10 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम का दर्जा दिया गया। वहीं वित्तीय  वर्ष 2010-11 के लिए निर्मल ग्राम के चयन की प्रक्रिया केन्द्र सरकार के पास भेज दी गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बंुदेलखड के सभी जनपदो से निर्मल ग्राम के बावत सूचियां मांगी हैं। यहां पंचायती राज्य विभाग में जनपद बांदा में वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए 47 ग्राम पंचायतो का प्रस्ताव ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास स्वीकृति के लिए भेजा है। प्रस्ताव में शामिल विकास खंड महुआ से पांच बडोखर खुर्द से आठ नरैनी से आठ, बिसंडा से सात, कमासिन से सात, बबेरू से पांच, जसपुरा से दो, व विकास खंड तिंदवारी से पांच ग्राम पंचायतो को निर्मल ग्राम की सूची में प्रस्ताव के लिए भेजा है। पंचायती राज विभाग में इन ग्राम पंचायतो को निर्मल ग्राम का दर्जा दिलाने के लिए तैयार मसौदे के मुताबिक पिछले सालों में जिन निर्मल ग्रामों को चयनित किया गया था उनकी पोल खुलने के बाद हकीकत से वाकिफ जिला पंचायत राज्य विभाग द्वारा फूंक फूंक कर कदम उठाए गए हैं।
जिला पंचायत राज अधिकारी सुशील शर्मा ने बताया कि केन्द्र सरकार ने निर्मल ग्राम के लिए प्रस्ताव मांगे थे जिस पर ऐसी ग्राम पंचायतो को चिन्हित कर प्रस्ताव भेजना था जो कि निर्मल ग्राम के मानकों को पूरा करती हो। सुशील शर्मा का कहना है कि पिछले चुने हुए निर्मल ग्रामों के प्रधानों के द्वारा उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के अनुसार ही निर्मल ग्राम चयनित हुए थे। बंुदेलखंड में गांव स्तर पर बने हुए शौचालय, स्नानघर के संबंध में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने हाथ खडे़ करते हुये कहा कि बंुदेलखंड में जागरूकता की कमी है। यह अलग बात है कि मार्च 2012 तक 508.53 लाख रू0 शौचालय निर्माण की धनराशि पर खर्च किए जा चुके हैं। वर्ष 2003-04 से 31 मार्च 2012 तक जिले के प्राथमिक विद्यालयांे मे महज 1701 शौचालय बनाए गए हैं जबकि जनपद में कुल प्राथमिक विद्यालयों की सं0 2100 है। प्राइमरी विद्यालयों के बालक बालिकाओं के लिए निर्मल ग्राम के मुताबिक अलग-अलग शौचालय निर्माण का मानक है। प्राथमिक विद्यालय के स्तर पर बनाए गए बालक बालिकाओं के अलग अलग शौचालय को प्रति यूनिट 20,000 रू0 अनुदान दिया जाता है। जनपद चित्रकूट के मारा चन्द्रा गांव और जनपद बांदा के नरैनी विकास खंड के ग्राम उदयपुर बदौसा क्षेत्र, निर्मल ग्राम से पुरस्कृत लुकतरा गावं के शौचालय स्नानघर भ्रष्टाचार की बानगी हैं।
निर्मल ग्राम योजना की सफलता का नमूना अगर बुंदेलखण्ड के सातों जिलों में देखना है तो किसी भी नेशनल हाइवे सुबह पांच बजे से लेकर सूर्योदय तक और पूर्णमासी, अमावस्या के धार्मिक पर्व में जनपद चित्रकूट में लगी रेलम पेल भीड़ को सुबह पांच बजे से सात बजे तक शाइनिंग इंडिया के नाम पर देखा जा सकता है। निर्मल गांव के मानक की बात करें तो चयनित गांव के चयन में तथ्यों को अमूमन छिपाया जाता है। निजी शौचालयों को भी स्वच्छता अभियान मे शामिल करके दिखाना जिला पंचायत राज्य विभाग के लिए अतिश्योक्ति पूर्ण नही है। जनपद बांदा में ब्लाॅकवार शौचालयों की स्थिति को कागजी आकडो मे देखा जा सकता है।
ब्लाक    लाभान्वित परिवार    शौचालय विहीन
बबेरू    5781    20128
जसपुरा    2442    12830
बिसंडा    5735    14934
तिंदवारी    8743    13163
कमासिन    4956    11904
नरैनी    9426    32561
वर्ष 2011-12 मे प्रस्तावित जनपद बांदा के निर्मल ग्राम
ब्लाक    गंव    जनपद
जसपुरा    टमारा    बांदा
बिसंडा    बिसंडी, कैरी    बांदा
बांदा जिले के बीते वर्षो में बीस गांव को निर्मल ग्राम पंचायत का खिताब दिया गया है। इनमे से छिबांव, लामा, लुकतरा, चन्द्रावल, पल्हरी, बेर्रांव, सुनहला, जंगरेही, बगेहटा, कुचेंदू, सेगरा, बडोखरखुर्द, गौरी खुर्द, डिंगवाही, अर्जुनाह (अम्बेडकर गांव), कनाय, खप्टिहां कला व साणी गावं को निर्मल गांव से पुरस्कृत किया जा चुका है। निर्मल गांव चुने जाने पर ग्राम पंचायत के प्रधान को राष्ट्रपति की ओर से प्रशस्ति पत्र और एक लाख रू0 की नगद धनराशि दी जाती है। निर्मल गांव की संच्चाई जानने के लिए जब कोशिश की गई तो चैंकाने वाली तस्वीर सामने थी। निर्मल गांव से नवाजे जा चुके ग्राम लुकतरा में आज भी अधिकतर शौचालय अधूरे हैं, किसी शौचालय का दरवाजा नहीं है तो किसी की छत। जनपद चित्रकूट के सीतापुर ग्रामीण गांव के हालात जागरूकता के अभाव मे बद से बदतर हंैै। यहां के कुछ शौचालयों में पड़ताल के दरम्यान नीबू भरे पाए गए। जिला पंचायत राज्य अधिकारी चित्रकूट का बयान है कि जनपद चित्रकूट बंुदेलखंड का सर्वाधिक पिछड़ा इलाका है। ऐसे में ग्रामीण लोगांे को शौचालय में ही शौच करने की बात समझाना भैंस के आगे बीन बजाना है।
नरैनी विकास खंड के ग्राम बघेला बारी में शौचालय निर्माण का एक और कड़वा सच यह भी है कि यहां गरीब, अन्त्योदय कार्ड धारक किसानों के लिए शौचालय की बात करना बेमानी है। बघेलाबारी के विकास यादव पुत्र स्व0 श्री सुरेश यादव ने बताया कि उसके पिता की 18 जून 2011 को मात्र 21000 रू0 कर्ज न चुका पाने के कारण खुदकुशी से मृत्यु हो चुकी है। वर्ष 2008 मेें सुरेश यादव की पत्नी सरस्वती कैंसर की बीमारी से जूझती हुई मौत के मुह मंे समा गई। माता पिता की वीभत्स तरीके से हुई मौत, गरीबी से लाचार विकास यादव ने कहा कि मेरे ऊपर दो छोटी बहनों का भार है। चैदह वर्षीय परिवार के इस नाबालिक मुखिया का तल्ख लहजे में कहना है कि डेढ़ माह के लम्बे संघर्ष, चार दिन तक आमरण अनशन के बाद मुझे प्रशासनिक राहत के नाम पर एक इंदिरा आवास मिला है। जिसकी पहली किस्त 30,300 रू0 प्राप्त हुई है। शेष दूसरी किस्त त्रिवेणी ग्रामीण बैंक में ग्राम सचिव की सत्यापन रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। इंदिरा आवास की अधूरी दीवारों और खुले आसमान की तरफ निहारती गरीबी की छत के लिए मेरे 11,000 रू0 स्वयं के खर्च हो चुके हैं क्यों कि ग्राम सचिव ने हिदायत दी है कि इंदिरा आवास के लिए एक मुश्त दी गई 45000 रू0 की धनराशि में शौचालय भी बनवाना अनिवार्य है। इधर विकास का कहना है कि बढ़ती हुयी मंहगाई, एक अनाथ, भूमिहीन किसान जिसके सिर पर 14 वर्ष में दो छोटी बहनों का भार हो, के लिए क्या ग्राम सचिव की बात पूरी कर पाना मुनासिब है?
आइने में उत्तर प्रदेश
ऽ    प्रदेश के 3.62 करोड़ घरों में नहीं है शौचालय, स्नानघर
ऽ    कुल 3.29 करोड घरो में से 2.14 करोड़ घरो में आज भी नहीं बने शौचालय
ऽ    148 करोड़ घर ऐसे हैं जिनमें नहीं है स्नानघर
ऽ    वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की 65 फीसदी आबादी हैंडपंप से पानी पीेने के लिए आश्रित है।
ऽ    64.4 फीसदी मकानों में शौचालय नहीं है।
ऽ    53.8 फीसदी घरो में रसोई घर नहीं है।
ऽ    47.7 फीसदी ग्रामीण तबका आज भी लकड़ी, उपले, जलावन से ही बनाता है रोटी
ऽ    23.3 फीसदी लोग रहते है बांस, घास, छप्पर के नीचे।
ऽ    पांच फीसदी से ज्यादा लोग पीते हैं प्रदूषण जनित बावड़ी और पोखरों का पानी
ऽ    प्रदेश की 64 फीसदी आबादी के पास उपलब्ध है हाईटैक मोबाइल फोन
बुंदेलखंड में बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झाांसी और ललितपुर मे गांव के  लगभग हर दूसरे घर में आज भी खुले में शौच जाने का चलन घर की जवान बिटियां आम बात है। संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय व स्नानघर देखने को प्रदेश सरकार व केन्द्र सरकार के लिए भले ही खबरिया न्यूज चैनलों में विकास की अफलातून जिंदगी का हिस्सा हो लेकिन बंुदेलखंड के पिछडे़ क्षेत्रों मे जिला प्रशासन सहित प्रदेश सरकार के लिए भी शौचालय, स्नानघर प्रत्येक गरीब परिवार को दिला पाना विकासशील भारत की बड़ी चुनौती होगी। हाशिए पर शौचालय और स्वच्छता से जूझती बुंदेलखंड की ग्रामीण आबोहवा के लिए जरूरी है कि नीति निर्धारको को योजना के नाम पर करोडों रूप्ए लुटाने के पक्ष पर मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता अपनानी चाहिए ताकि हर गरीब को इज्जत बचाने के लिए आड़ मिले़, अधखुले बदन की महिला को दिशा मैदान जाने का रास्ता न अख्तयार करना पडे़।

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