Wednesday, April 11, 2012

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करोड़ों रूपयों की बेनामी सम्पत्ति अपने ट्रस्ट के नाम करवाने की पोल खोलती रिपोर्ट
आशीष सागर
बांदा – उ0प्र0 सरकार के पूर्व खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा उर्फ रामशरण कुशवाहा की यूं तो बसपा मुखिया मायावती से काफी नजदीकियां सरकार के अन्तिम पांचवें साल तक रही हैं। मगर आहिस्ता- आहिस्ता मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और बसपा के सबसे ताकतवर मंत्री तथा लोक आयुक्त की जांच में फंसे कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी जिनके लिए लोक आयुक्त ने सी0बी0आई0 और परिवर्तन निदेशालय से जांच करवाए जाने की सिफारिश की है, के बीच भारी तल्खियां बढ़ने लगी। पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के सिर पर इस दरम्यान आरोपों की बारिश होती रही। परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा एक तरफ सी0बी0आई0 जांच की गिरफ्त मे हैं तो दूसरी तरफ लोक आयुक्त ने चार बड़ी शिकायतों पर पूर्व खनिज मंत्री के ऊपर जांच में गम्भीर अनियमितताएं पाए जाने पर जांच की सिफारिश मुख्यमंत्री से की थी। सत्ता की हनक और अपने चहेतों को भू-माफियाओं में तब्दील करने की मंशा बाबू सिंह के हर उस सपने को बेनकाब करती है जिसका दूसरा रूप चल-अचल सम्पत्ति को भागवत प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट में सम्मिलित करना रहा है।
करीब 27 एकड़ कृषि योग्य भूमिधरी की जमीन पर बाबू सिंह कुशवाहा ने कभी तंत्र की दहशत से तो कभी सत्ता की दबंगई से भूमि के मालिकों के ऊपर रौब जमाया। बांदा के मौजा हरदौली स्थित भूमिधरी कृषि योग्य सिंचित जमीन को बसपा सरकार के पूर्व कद्दावर मंत्री एवं स्वास्थ्य परिवार कल्याण विभाग के मुखिया बाबू सिंह कुशवाहा ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट श्रीनाथ प्रापर्टीज के लिए सारे हथकण्डे अख्तयार किए। सब रजिस्ट्रार उप निबन्धक कार्यालय बांदा के क्रम संख्या गाटा नं0- 3885, 3886, 3887 के पीछे छुपी है श्रीनाथ प्रापर्टीज की काली असलियत। श्रीनाथ प्रापर्टीज की इस योजना निर्माण कार्य को अमली जामा पहनाने के लिए जमीन पर काबिज असल कब्जेधारकों को सियासत के रूतबे से भू-माफियाओं ने बेदखल कर दिया। दस्तावेज और कागजी साक्ष्य बताते हैं कि इस कड़ी के सबसे पहले सूत्रधार बने बाबू सिंह कुशवाहा के फुफेरे भाई व पिछड़ा वर्ग आरक्षण बचाओ मंच के बांदा अध्यक्ष लक्ष्मी प्रसाद कुशवाहा। लक्ष्मी प्रसाद की एक और पहचान बुन्देलखण्ड के खनन माफियाओं में की जाती है। सूत्र बताते हैं कि महोबा जनपद के ग्राम जुझार के अन्तर्गत बड़ा पहाड़ में गाटा नं0 2/4 से इनके तार सीधे रूप में खनन पट्टेधारक पर दर्ज हैं। हरदौली घाट की कृषि जमीन के गाटे 3885 में 0.979 हे0 जमीन का बैनामा पूर्व मंत्री ने लक्ष्मी प्रसाद कुशवाहा पुत्र चुन्ना प्रसाद को दिनांक 3.10.2008 को करवाया। गाटे सं0 3886, 3887 में 10.174 हे0 जमीन पर बैनामा ठीक इसी तारीख 3.10.2008 को ही उप निबन्धक बांदा के कार्यालय से अपने करीबी ठेकेदार दिलीप सिंह पुत्र शिवकरण सिंह के नाम दर्ज करवाया गया तथा इन्हें ही श्रीनाथ प्रापर्टीज फर्म में बतौर सदस्य शामिल किया गया। जमीन के कुछ हिस्से पर कब्जे धारकों से पड़ताल के दौरान जब वार्ता की गई तो उन्होंने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि मौजा हरदौली के 36 गाटों की भूमि का बैनामा जो क्रम संख्या 3885, 3886, 3887 में दर्ज है के खातेदारों द्वारा उनके हक से अधिक जबरन बैनामा करवाया गया। यह तथ्य ही बैनामों की सत्यता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
गौरतलब है कि लोक आयुक्त के समक्ष की गई शिकायतों में भी श्रीनाथ प्रापर्टीज की इस बेनामी सम्पत्ति का हवाला दिया गया है। जमीन के कुछ हिस्से के एक कब्जेधारक कहते हैं कि शहर के 74 वर्षीय वृद्ध से भूमिधरी जमीन बैनामा न करने की स्थिति में उस पर मनोवैाानिक दबाव बनाया गया है। आरोप हैं कि बैनामा न करने की स्थिति में पूरी जमीन को सरकारी योजनाओं के अन्दर अधिग्रहण करवाए जाने की धमकियां दी जाती रहीं। मौजा हरदाली की उक्त भूमि कुल 36 गाटे की शेष बची 3.709 हे0 भूमि को जब उस वृद्ध ने विक्रय से मना किया तो उन्हें और उनके भाईयों को तरह-तरह से जान माल की धमकियां भी दी गयीं। घरों से निकलना, सुरक्षा के साथ जिन्दगी बसर करने जैसे तमाम सवालात भूमि मालिकों के समक्ष पहाड़ की तरह खड़े हो गए। आनन फानन में मजबूरन भूमि के मालिकों को शेष बची जमीन भी पूर्व मंत्री के ट्रस्टी सदस्य दिलीप सिंह के नाम करनी पड़ी। भूमि मालिकों ने अपने दिए बयान में कहा कि पूर्व मंत्री के द्वारा अपने भाई, चहेतों ठेेकेदारों के पक्ष में इस जमीन को अर्जित करने के लिए क्या साधन अपनाए गए और उनके आय के स्रोत क्या रहे यह जानने की कोशिश सरकार, प्रशासन ने कभी नहीं की। जनसूचना अधिकार 2005 से प्राप्त जनपद बांदा में चलाए जा रहे खनन पट्टों की सूची पर गौर करें तो बालू, पत्थर खदानों के पट्टेधारकों की फेहरिस्त में दिलीप सिंह, लक्ष्मी प्रसाद, सीरज ध्वज सिंह, रामयश द्विवेदी जैसे अन्य कई नाम हैं जिन्हें पूर्व खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा का डमी ठेकेदार कहा जाता है। सी0ए0जी0 (कैग) की रिपोर्ट के मुताबिक बुन्देलखण्ड से सलाना 510 करोड़ रूपये राजस्व खनन से प्राप्त होता है। वर्ष 2011 में ही 258 करोड़ रूपये राजस्व की चोरी खनन माफियाओं के द्वारा गुण्डा टैक्स और तह बाजारी में की गई है। अन्य लोगों से भी जब श्रीनाथ प्रापर्टीज के बन्दरबाट की बातचीत की गई तो सामने उभर कर आई सच्चाई यह भी है कि मौजा हरदौली परगना बांदा में स्थित गाटा सं0 874 के जुज गाटे में 10 बिस्वा (0.088हे0) सड़क से लगी भूमि ग्राम सभा हरदौली के राजस्व रिकार्डों में दर्ज रही तथा नक्शे में भी दर्ज बताई जाती है लेकिन सत्ता और सियासत के सामने अपंग हुई व्यवस्था ने जैसे दम ही तोड़ दिया। चहेते ठेकेदारों ने 10 बिस्वा भूमि ग्राम सभा हरदौली बांदा के राजस्व रिकार्डों से हटवा दी। यह सब कारगुजारी अनैतिक बल प्रयोग से तत्कालीन रजिस्ट्रार विभाग के कर्मचारियों द्वारा करवाए गए। इस जमीन के एक अन्य कब्जेधारक ने आरोप लगाया है कि परिजनों की तरफ से भूमिधरी मौजा हरदौली की कृषि जमीन मंे स्थित 14.862 हे0 भूमि के बटवारे के लिए वाद संख्या 27/2008 तत्कालीन असिस्टेंट कलेक्टर बांदा के समक्ष दायर किया गया था। वाद में ग्राम सभा को भी पक्ष बनाया गया परन्तु तत्कालीन कलेक्टर प्रथम श्रेणी बांदा ने पूर्व मंत्री की रंगदारी और सत्तादारी का ख्याल रखकर गैर जिम्मेदाराना पूर्ण आदेश करने से गुरेज नहीं किया। खास पक्ष श्रीनाथ प्रापर्टीज के सम्बन्ध में दस्तावेजों के हवाले से निकलकर आता है कि भागवत प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट के लिए स्टाम्प की खरीद 6.2.2006 को लखनऊ से की गई। तब से पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा इस फिराक में रहे कि किस तरह नामी बेनामी सम्पत्तियों को ट्रस्ट का हिस्सा बनाया जा सके। सूत्र बताते हैं कि बांदा के अतर्रा क्षेत्र में खुले तथागत ज्ञानस्थली आवासीय विद्यालय, निर्माणाधीन महाविद्यालय भी इसी ट्रस्ट का हिस्सा हैं। सरकारी दांव पेंच से बचने हेतु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 21(1860) के अधीन एक वेल्फेयर सोसाइटी स्व0 पिता के नाम पर बाबू सिंह के मारफत बनाई गई। रजिस्ट्रार चिट्स फर्म कार्यालय लखनऊ के पते से 27.5.2009 को सन्दर्भ संख्या 1551, पत्रावली संख्या 1-157497 ट्रस्ट की पंजीकरण संख्या है।
ट्रस्ट डीड में मंत्री बाबू सिंह की धर्मपत्नी श्रीमती शिवकन्या, शिवशरण जो बाबू सिंह के सगे भाई हैं तथा रामप्रसाद जायसवाल जो बाबू सिंह के सलाहकार माने जाते हैं को उक्त ट्रस्ट के चेयरमैन के रूप में रखा गया। ट्रस्टी सदस्य करीबी ठेकेदारों मसलन दिलीप सिंह, सीरज ध्वज सिंह पुत्र महिरत ध्वज सिंह और लक्ष्मी प्रसाद को बनाया गया। मौजा हरदौली की जमीन में आवासीय स्कूल की जमीन क्रय करके इसका शिलान्यास भी बसपा सरकार के प्रिय तत्कालीन जिलाधिकारी रंजन कुमार व आयुक्त चित्रकूट धाम मण्डल बांदा के कर कमलों से विधिवत कार्ड छपवाकर वर्ष 2009 में सम्पन्न करवाया गया। करोड़ों रूपयों की इस तथाकथित बेनामी सम्पत्ति के वारिसों को इनकम टैक्स और अन्य कागजी कार्रवाइयों से बचाने के लिए पूर्व नियोजित ट्रस्ट डीड एवं भूमिधरों के भूमि की बैनामा नकलें संलग्न कर इसके निर्माण के लिए स्थानीय पंजाब नेशनल बैंक शाखा से कई करोड़ रूपये के ऋण के लिए आवेदन भी किया गया। आर0टी0आई0 से प्राप्त सूचनाएं इस बात का खुलासा करती हैं। सब कुछ तयशुदा प्लान के मुताबिक होने पर बाबू सिंह का सपना मनी-मनी चरितार्थ होने की कगार पर था। जमीन की बाकायदा हजारों रूपयों में प्रति स्क्वायर मीटर के हिसाब से प्लाटिंग भी की गई और बांदा शहर के नामी गिरामी लोगों द्वारा श्रीनाथ प्रापर्टीज में अपने सपनों को पंख देने के लिए मकानों का आशियाना ढूंढा जाने लगा। समीचीन यह है कि मौजा हरदौली के 36 जाये की भूमि का लेआउट विकास प्राधिकरण बांदा से पास आन हेतु 12.10.2009 को प्रस्तुत की गई। जिसमें चार व्यक्तियों क्रमशः दिलीप सिंह, राहुल सिंह पुत्र राजेन्द्र सिंह, लक्ष्मी प्रसाद, गिरधारी लाल कुशवाहा पुत्र देवीदीन जो कि बाबू सिंह के भांजे के नाम पर 28.9.2010 को पास कराया गया। इसमें सड़क तरफ की ग्राम सभा भूमि मिलाकर 26204.10 स्क्वायर मीटर कामर्शियल क्षेत्र तथा 209 आवासीय प्लाट तैयार किए गए।
भू-माफियाओं ने आवासीय प्लाटों को विक्रय करके क्रेताओं के लिए नक्शे बनवाने हेतु विकास प्राधिकरण बांदा को आवेदन प्रस्तुत किया। विकास प्राधिकरण बांदा में संलग्न नक्शे को दिलीप सिंह द्वारा प्रस्तुत किए जाने पर आपत्ति लगाई थी लेआउट 4 व्यक्तियों की तरफ से पास कराया गया है जबकि एक आदमी के नाम से जमीन विक्रय की गई है। इसलिए इस नक्शे को स्वीकृति नहीं दी जा सकती है। अन्दर की खबर यह भी है कि इस रिहायशी जमीन पर बने भवन के एक मंजिल का ही नक्शा विकास प्राधिकरण से पास करवाया जा सका है तो क्या हुआ कि इसमंें 3 से 4 मंजिला भव्य इमारतों का काम आज भी बेखौफ चालू है। इस जमीन के वारे न्यारे करने के पीछे एक मंजे हुए खिलाड़ी अनिल कुमार पुत्र पन्नालाल भी बताए जाते हैं। जिन्होंने अपने सहभागियों को कम और खुद आवश्यकता से अधिक जमीन विक्रय करवाई। जहां अभी तक एन0आर0एच0एम0 घोटाले में फंसे पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की आय से अधिक सम्पत्तियों के स्रोतों की छानबीन अन्य जनपदों के साथ-साथ बांदा में भी की जा चुकी है। श्रीनाथ प्रापर्टीज की बेनामी सम्पत्ति इस कड़ी का एक और हिस्सा है। बांदा जनपद के करीब दो सैकड़ों लोगों के सपनों को घर अभी तक नहीं मिला। बांदा जैसे पिछड़े इलाके में श्रीनाथ प्रापर्टीज को देखकर मानो गंजे को नाखून ही मिल गए हों। बांदा की जनता में हिलोरे मारकर उठता रहा श्रीनाथ प्रापर्टीज में घर लेने का सपना और कहीं न कहीं इस पूरे प्रकरण में वट वृक्ष बनकर तैयार हुई बाबू सिंह की बेनामी सम्पत्ति।
आशीष दीक्षित सागर, बुंदेलखंड क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता एवं जन सूचना अधिकार एक्टिविस्ट है ,बुंदेलखंड में गुजरे तीन वर्षो से यह पर्यावरण - वन जीवो ,जल ज़मीन और जंगल को बचाने की मुहिम को लेकर सक्रिय है साथ ही वहां किये जा रहे खनन माफियाओ के काला सोना ( ब्लैक स्टोन ) की खदानों से टूटते पर्यावरण के इको सिस्टम को सहेजने के लिए लगातार बुन्देली बाशिंदों के बीच समाज कार्य करते है, लेखक बतौर प्रवास सोसाइटी के संचालक की भूमिका में किसान ,मजदूर ,महिलाओ और आदिवासियों के पुनर्वास का भी जन अभियान चलाने का बीड़ा उठाये है !

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