Thursday, January 21, 2016

असल में मूल दलित कौन है !

दुःख तो इसका है यह राष्ट्र आज तक दलित शब्द को सही से परिभाषित ही न कर सका ! जातिवाद के जहर ने वोटो की खेती इतनी सबल की है कि उसको हर दल और प्रत्येक जातिगत संघठन काटना चाहता है अपनी नजर और अपने हथकंडे से !....गाँधी ने दलित और अछूत शब्द का परेहज करने की हिदायत देते हुए 'हरिजन ' का उद्घोष किया था जिसको कांग्रेस ने कैश किया गाँधीवादी चोचले में !...आज भी कर रही है मगर अन्य आज तक ये निर्णय न कर सके कि वास्तव में दलित कौन है ? वो जो दीनहीन और असहाय है,दरिद्र या वो जो सबल और संसाधन से संपन्न ? ...सामंती सोच सामर्थ्य से आती है यथा इस देश में जैसे अल्पसंख्यक ( सियासत में मात्र जनसंख्या में नही ! ) वोट की खेती है वैसे ही दलित शब्द का प्रवचन !.....दलित की राजनीती करने वाले दौलत की बेटी या अरबपति बन चुके है वही अल्पसंख्यक के नेता बाहुबली - भ्रष्ट नेता !....इन पर कोई प्रखर रणनीति नही उतरती युवा जनज्वार में !.....दलित साहित्यकार सम्मानों तक सिमटे या भाषाई लाल सलाम तक ! सबसे पहले तो यही निर्णय हो कि दलित और सबल कौन है ?
( तस्वीर में बाँदा के नरैनी तहसील के सुलखान पुरवा में अल्पसंख्यक बच्चे अपना भविष्य खेलते हुए ! ) यह असल में वैचारिक दलित परिवार के मासूम ही है जो सरकारी मदद मिल जाने पर आरामतलबी हुए !....बुन्देलखण्ड हो अथवा दूसरी कोई प्रान्त की मिट्टी इस मुल्क को इन्ही दलित और अल्पसंख्यक के अंतरघात से सुरक्षित रखने की दरकार है ताकि किसान का बेटा न तो सामंती बने, न मुफ्तखोर और न दलित !...आजादी के इतने बरस बाद भी दलित दर्शन का आधा-अधूरा,भ्रमित करने वाला दर्शन देश के लाखो युवा को दिशा और दशा बिगाड़ रहा है ! इसको बचाना उतना ही लाजमी है जितना भारत को चिर स्थाई विकास की समग्रता देना !

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